Kavita Seth, Iktara: We need your help!

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Iktara
by Kavita Seth

ओरे मनवा तू तो बावरा है
तू ही जाने तू क्या सोचता है
बावरे
क्यूँ दिखाए सपने तू सोते जागते
जो बरसें सपने बूँद-बूँद
नैनों को मूँद-मूँद
कैसे मैं चलूँ देख न सकूं
अनजाने रास्ते
गूंजा सा है कोई इकतारा इकतारा
धीमे बोले कोई इकतारा

सुन रही हूँ सुधबुध खो के
कोई मैं कहानी
पूरी कहानी है क्या, किसे है पता
में तो किसी की हो के, ये भी न जानी
रुत है यह दो पल की या, रहेगी सदा
किसे है पता..

जो बरसें सपने बूँद-बूँद
नैनों को मूँद-मूँद
कैसे मैं चलूँ, देख न सकूं
अनजाने रास्ते
गूंजा सा है कोई इकतारा इकतारा...
धीमे बोले कोई इकतारा...

Contributed by Nathaniel E. Suggest a correction in the comments below.
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